गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

४.५ किसी से कुछ लेना

यथा मधु समादत्ते रक्षन् पुष्पाणि षट्पदः।
तद्वदर्थान्मनुष्येभ्य आदद्यादविहिंसया।।४.५.१।।

जिस तरह भौंरा पुष्पों को बिना कष्ट पहुँचाये उनकी रक्षा करते हुए ही उन पुष्पों के शहद को ग्रहण करता है।  उसी प्रकार राजा भी अपनी प्रजा को बिना हानि पहुँचाये उनसे धन ले।

पुष्पंपुष्पं चिचिन्वीत मूलच्छेदं न कारयेत्।
मालाकार इवारामं न यथांगारकारकः ।।४.५.२।।

जैसे बगीचे का माली एक - एक पुष्प तोड़ता है , वृक्षों की जड़ों को नहीं काटता।  उसी प्रकार राजा को भी अपनी प्रजा की रक्षापूर्वक उनसे कर ग्रहण करना चाहिये।  कोयला बनाने वाले की भांति जड़ नहीं काटनी चाहिये अर्थात् प्रजा को नष्ट नहीं करना चाहिये।

४.४ फल

वनस्पतेरपक्वानि  फलानि प्रचिनोति यः।
स नाप्नोति रसं तेभ्यो बीजं चास्य विनश्यति।।४.४.१।।

जो मनुष्य वृक्षों से कच्चे फलों को तोड़ लेता है , उसे उन फलों से वास्तविक रस तो मिलता नहीं , बल्कि उन वृक्षों का बीज अवश्य नष्ट हो जाता है।

यस्तु पक्वमुपादत्ते काले परिणतं फलम्।
फलाद्रसं स लभते बीजाच्चैव फलं पुनः ।।४.४.२।।

जो व्यक्त्ति पेड़ से फल को पकने के बाद तोड़ता है , उसे उस फल का वास्तविक रस भी प्राप्त होता है और बीज से पुनः फल की प्राप्ति भी करता है।

४.३ लोभ और परिणाम

भक्ष्योत्तमप्रतिच्छन्नं मत्स्यो बडिशमायसम्।
लोभभिपाती ग्रसते नानुबन्धमवेक्षते।।४.३.१।।

मछली अच्छी चारे से ढकी हुई लोहे की कांटी को लोभवश पकड़कर खा जाती है।  उससे मिलने वाले परिणामों के बारे में नहीं सोचती है।

यक्ष्छक्यं ग्रसितुं ग्रस्यं ग्रस्तं परिणमेच्च यत्।
हितं च परिणामे यत्तदाद्यं भूमिमिच्छता ।।४.३.२।।

अतः अपनी उन्नति चाहने वाले पुरुषों को वही वस्तु ग्रहण करनी चाहिये जो उसके योग्य हो।  जो उससे ग्रहण की जा सके , जो ग्रहण करने के बाद पच सके तथा पचने के बाद जो हितकारी भी हो।

४.२ राजा और राज्य

यः प्रमाणं न जानाति स्थाने वृद्धौ तथा क्षये।
कोशे जनपदे दण्डे न स राज्येऽवतिष्ठते।।४.२.१।।

जो राजा अपनी स्थिति , हानि - लाभ , विनाश , धनागार देश और दण्ड आदि के संबंध में नहीं जानता।  ऐसा राजा अपने राज्य पर स्थिर नहीं रह सकता है।

यस्त्वेतानि प्रमाणानि यथोक्तान्यनुपश्यति।
युक्तो धर्मार्थयोर्ज्ञाने स राज्यमधिगच्छति ।।४.२.२।।

जो राजा उपरोक्त्त कहे गये प्रमाणों को ठीक -ठाक जानता है तथा धर्म और अर्थ के ज्ञान में दत्तचित्त रहता है।  वही राजा राज्य प्राप्त करता है।

न राज्यं प्राप्तमित्येव वर्तितव्यमसाम्प्रतम्।
श्रिय ह्यविनयो हन्ति जरा रूपमिवोत्तमम्।।४.२.३।।

राजा को चाहिये कि वह राज्य मिल जाने पर किसी से अनुचित व्यवहार न करे।  नहीं तो जिस प्रकार व्यक्त्ति की सुन्दरता को बुढ़ापा नष्ट कर देती है।  उसी प्रकार राजा की उद्दण्डता उसकी सम्पूर्ण लक्ष्मी का विनाश कर देती है।

प्रसादो निष्फलो यस्य क्रोधश्र्चापि निरर्थकः।
न तं भर्तारमिच्छन्ति षण्ढं पतिमिव स्त्रियः।।४.२.४।।

जिसके प्रसन्न होने का कोई लाभ नहीं और जिसका क्रोध करना भी व्यर्थ हो ऐसे मनुष्य को प्रजा राजा बनाना उसी प्रकार नहीं चाहती है , जिस प्रकार एक स्त्री किसी नपुंसक को अपनाना नहीं चाहती है।

ऋजु पश्यति यः सर्वं चक्षुषानुपिबन्निव।
आसीनमपि तूष्णीकमनुरज्यन्तितं प्रजाः।।४.२.५।।

जो राजा अपनी प्रजा को सदैव प्रेमपूर्वक दृष्टि  से देखता है।  वह राजा यदि चुपचाप बैठा रहे कुछ न करे तो भी उसकी प्रजा उससे अनुराग रखती है।

४.१ कार्य और कर्म

तथैव योगविहितं यत्तु कर्म न सिध्यति।
उपाययुक्तं मेघावी न तत्र ग्लपयेन्मनः।।४.१.१।।

अच्छे उपायों का प्रयोग करके और सावधानीपूर्वक कार्य करने से भी जिस कार्य में सफलता न मिले उसके लिये मन में ग्लानि नहीं रखनी चाहिये।

अनुबन्धानपेक्षेत सानुबन्धेषु कर्मसु।
सम्प्रधार्य च कुर्वति न वेगेन समाचरेत् ।।४.१.२।।

किसी उद्देश्य से करने वाले कर्मों में पहले उद्देश्य को अच्छी तरह समझ लेना चाहिये। अच्छी प्रकार सोच - विचारकर कार्य का आरंभ करना चाहिये।  जल्दबाजी में कोई कार्य आरंभ नहीं करना चाहिये।

अनुबन्धं च सम्प्रेक्ष्य विपाकं चैव कर्मणाम्।
उत्थानमात्मनश्र्चैव धीरः कुर्वीत वा न वा ।।४.१.३।।

धैर्यवान पुरुषों को चाहिये कि वह कार्य आरंभ करने से पहले अपने प्रायोजन उसके परिणाम तथा उससे मिलने वाली उन्नति पर विचार कर लें फिर कार्य आरंभ करे अथवा न करें।

किन्नु मे स्यादिदं कृत्वा किन्नु मे स्यादकुर्वतः।
इति कर्माणि सञ्चिन्त्य कुर्याद्वा पुरुषो न वा ।।४.१.४।।

मनुष्य को कर्मों को करने से पहले उसके परिणामों पर अच्छी तरह विचार कर लेना चाहिये कि उस कार्य से उसे हानि होगी या लाभ होगा। ऐसा विचार कर तब कार्य आरंभ करना चाहिये।

अनारभ्या भवनत्यर्थाः केचिन्नित्यं तथाऽगताः।
कुतः पुरुषकारो हि भवेद्येषु निरर्थकः।।४.१.५।।

कुछ ऐसे व्यर्थ कार्य होते हैं , जो प्रतिदिन न मिलने के कारण आरंभ करने योग्य नहीं होते हैं। ऐसे कार्यों के लिये किया गया परिश्रम व्यर्थ चला जाता है।  अतः ऐसे कार्यों को नहीं करना चाहिये।

कांश्र्चिदर्थान्नरः प्राज्ञो लघुमूलान्महाफलान्।
क्षिप्रमारभते कर्तुं न विघ्नयति तादृशान् ।।४.१.६।।

जिन कार्यों को करने में प्रयत्न कम करना पड़ता है और फल अधिक प्राप्त होता है।  बुद्धिमान व्यक्त्ति ऐसे कार्यों में बाधा नहीं आने देते और शीघ्र ही उन्हें प्रारंभ कर देते हैं।

बुधवार, 20 अप्रैल 2016

३.४० लज्जा

य आत्मनापत्रपते भृशं नरः स सर्वलोकस्य गुरुर्भवत्युत्।
अनन्ततेजाः  सुमनाः समाहितः स तेजसा सूर्य इवावभासते।।३.४०।।

जो स्वयं लज्जालु है , वह सब लोगों में श्रेष्ठ समझा जाता है।  वह अपने तेज , शुद्ध हृदय  और एकाग्रता से युक्त्त होने के कारण सूर्य की कांति के भांति सुशोभित होता है।

३.३९ यश

यः सर्वभूतप्रशमे निविष्टः सत्यो मृदुर्मानकृच्छुद्धभावः।
अतीव स ज्ञायते ज्ञातिमध्ये महामणिर्जात्य इव प्रसन्नः।।३.३९।।

जो मनुष्य सभी लोगों को शांति प्रदान करने वाले कार्यों को करता है , सत्य बोलता है , कोमल हृदय वाला है , दूसरों का आदर करता है , शुद्ध विचार वाला होता है , वह अच्छी खान से निकले हुए और चमकते हुए रत्न के समान अपनी जाति वालों में यश प्राप्त करता है।