शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

४.२८ शक्ति

हिंसा बलमसाधूनां राज्ञां दण्डविधिर्बलम्।
शुश्रूषा तु बलं स्त्रीणां क्षमा गुणवतां बलम्।।४.२८।।

दुर्जनों की शक्त्ति हिंसा अर्थात् झगड़ा है।  राजाओं की शक्त्ति उनकी दण्ड देने की प्रवृत्ति है स्त्रियों की शक्त्ति उनकी सेवा भाव है तथा गुणवान लोगों की शक्त्ति क्षमा है।

४.२७ कटु वचन और निन्दा

आक्रोशपरिवादाभ्यां विहिंसन्त्यबुधा बुधान्।
वक्ता पापमुपादत्ते क्षममाणो विमुच्चते।।४.२७।।

मुर्ख लोग विद्वानों को कठोर बातें बोलकर और उनकी बुराई कर उन्हें दुःख देते हैं। अतः कटु वचन और निन्दा करने वाला व्यक्त्ति सदा पाप का भागी होता है। जो इनको सहकर क्षमा कर देता है , वह पाप से मुक्त्त हो जाता है।

४.२६ दुर्जन और अधम पुरुष

अनसूयार्जवं शौचं सन्तोषं प्रियवादिता।
दमः सत्यमनायांसो न भवन्ति दुरात्मनाम्।।४.२६.१।।

दूसरों के गुणों में दोष न खोजना , कोमल हृदय , पवित्रता , संतोष , मधुर वाणी , इन्द्रियदमन , सत्य बोलना तथा स्थिरता , ये सभी गुण दुर्जनों में कभी नहीं होते हैं।

आत्मज्ञानमनायासस्तितिक्षा धर्मनित्यता।
वाक् चैव गुप्ता दानं च नैतान्यन्त्येषु भारत।।४.२६.२।।

हे राजन् ! आत्मज्ञान, स्थिरता , धर्म - परायणता , सहनशीलता , वचन की रक्षा तथा दान आदि ये सभी गुण अधम पुरुषों में नहीं होते हैं।

४.२५ संगत

असंत्यागात्पापकृतामपापांस्तुल्यो  दण्डः स्पृशते मिश्रभावात्।
शुष्केणार्द्रं दह्यते मिश्रभावात्तस्मात्पापैः सह सन्धिं न कुर्यात्।।४.२५।।

पाप वाले कर्मों में लगे व्यक्त्ति को छोड़ देना चाहिये अर्थात् उनकी संगत नहीं करना चाहिये ; क्योंकि पापियों के संग रहने से अच्छा व्यक्त्ति भी उसी प्रकार दंड का भागी बनता है , जिस प्रकार गीली लकड़ियों के साथ सूखी लकड़ियां मिलकर जल जाती हैं।

४.२४ धर्म तथा अर्थ

समवेक्ष्येह धर्मार्थौ सम्भारान् योऽधिगच्छति ।
स वै सम्भृतसम्भारः सततं सुखमेधते।।४.२४।।

जो व्यक्त्ति इस संसार में धर्म तथा अर्थ दोनों पर भली -भांति विचार कर अपने साधनों को संग्रह करता है , तो वह साधन सामग्री से युक्त्त होने के कारण सदा सुखपूर्वक रहता है।

४.२३ काम तथा क्रोध

क्षुदाक्षेणैव जालेन झषावपिहितावुरू।
कामश्र्च राजन् क्रोधश्र्च तौ प्रज्ञानं विलुम्पतः।।४.२३।।

हे राजन् ! जिस तरह छोटे - बड़े छिद्रों वाले जल में फँसी दो बड़ी -बड़ी मछलियां उस जाल को काटकर नष्ट कर डालती हैं।  ठीक उसी तरह व्यक्त्ति का काम तथा क्रोध उसके ज्ञान को लुप्त कर देते हैं।

४.२२ व्यक्ति और उसकी आत्मा

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनैवात्मात्मना जितः।
स एव नियतो बन्धुः स एव नियतो रिपुः।।४.२२।।

जिस व्यक्त्ति ने अपनी आत्मा को जीत लिया है , तो उसकी आत्मा ही उस व्यक्त्ति की सबसे बड़ी मित्र है ; क्योंकि आत्मा ही व्यक्त्ति की सबसे बड़ी मित्र और शत्रु है। अर्थात् जिसने अपनी आत्मा को जीत लिया है , तो वह आत्मा मित्र है। इसके विपरीत जिसने अपनी आत्मा को नहीं जीता , तो वही उसकी सबसे बड़ी शत्रु बन जाती है।