मंगलवार, 24 मई 2016

५.१७ प्रशंसा

जीर्णमन्नं प्रशंससन्ति भार्यां च गतयौवनाम्।
शूरं विजितसंग्रामं गतपारं तपस्विनम्।।५.१७।।

जो सज्जन पुरुष होते हैं , वह भोजन के पच जाने पर अन्न की , निष्कलंक यौवन बीत जाने पर स्त्री की , युद्ध में विजय प्राप्त कर लेने के बाद वीर की तथा तत्त्वज्ञान प्राप्त हो जाने पर तपस्वी की प्रशंसा करते हैं।

५.१६ सुख

अनसूयुः कृतप्रज्ञः शोभनान्याचरन्सदा।
न कृच्छ्रं महदाप्नोति सर्वत्र च विरोचते।।५.१६.१।।

जो मनुष्य दूसरों की बुराई नहीं करता , सभी कार्यों को शुद्ध बुद्धि का प्रयोग करके करता है।  ऐसा मनुष्य सदैव शुभ कर्मों को करते हुए महान् सुख प्राप्त करता है तथा सर्वत्र यश की प्राप्ति करता है।

प्रज्ञामेवागमयति यः प्राज्ञेभ्यः स पण्डितः।
प्राज्ञो ह्यवाप्य धर्मार्थौ शक्रोति सुखमेधितुम्।।५.१६.२।।  

जो मनुष्य विद्वान् लोगों के संग रहता है , उसकी बुद्धि विकसित होती है तथा वही मनुष्य पण्डित कहलाता है; क्योंकि जो पण्डित होते हैं वह धर्म एवं अर्थ द्वारा अपने सुखों की वृद्धि करते हैं।

५.१५ पाप कर्म और पुण्य कर्म

पापं कुर्वन्पापकीर्तिः पापमेवाश्नुते फलम्।
पुण्यं कुर्वन्पुण्यकीर्तिः पुण्यमत्यन्तश्नुते।।५.१५.१।।

पाप कीर्ति वाला (गलत कार्य करने वाला ) मनुष्य पाप करते हुए पापरूप फल को ही प्राप्त करता है तथा पुण्य - कर्म (अच्छा कार्य करने वाला ) मनुष्य पुण्य करते हुए पुण्य रूप फल को ही प्राप्त करता है।  इसलिये मनुष्य को गलत कार्य छोड़कर सदैव अच्छे कार्य करना चाहिये ताकि उसे अच्छे कार्य का फल भी मीठा प्राप्त हो।

तस्मात्पापं न कुर्वीत पुरुषः शंसितव्रतः।
पापं प्रज्ञां नाशयति क्रियमाणं पुनः पुनः।।५.१५.२।।

इसलिये प्रशंसा प्राप्त यशवान् मनुष्य को पाप कभी नहीं करना चाहिये ; क्योंकि बार-बार पाप करने से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है।

नष्टप्रज्ञः पापमेव नित्यमारभते नरः।
पुण्यं प्रज्ञां वर्धयति क्रियमाणं पुनः पुनः।।५.१५.३।।

जिस मनुष्य की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है , वह निरन्तर पाप कर्म ही करता रहता है।  इसी प्रकार बार - बार  पुण्य कर्म करने से बुद्धि का विकास होता है।

वृद्धप्रज्ञः पुण्यमेव नित्यमारभते नरः।
पुण्यं कुर्वन्पुण्यकीर्तिः पुण्यस्थानं स्म गच्छति।
तस्मात्पुण्यं निषेवेत पुरुषः सुसमाहितः।।५.१५.४।।

जिस मनुष्य की बुद्धि विकसित होती है अर्थात् बुद्धि बढ़ती है , वह मनुष्य सदैव पुण्य कर्म करता है।  जिसके कारण वह यश प्राप्त करता है और पुण्य लोक की प्राप्ति करता है। इसलिये मनुष्य को सदैव सावधान होकर पुण्य कर्म करना चाहिये तथा पाप कर्म नहीं करना चाहिये।

५.१४ स्वर्ग प्राप्ति

सत्यं रूपं श्रुतं विद्या कौल्यं शीलबलं धनम्।
शौर्यं च चित्रभाष्यं च दशेमे स्वर्गयोनयः।।५.१४।।

सच बोलना , विनयशील होना , शास्त्रों का ज्ञान , विद्या , कुलीनता , शालीनता , बल , धन , शूरता - वीरता  तथा चमत्कारपूर्ण तरीके से बातें करना - यह दस स्वर्ग प्राप्ति के साधन हैं अर्थात् व्यक्त्ति को इनका अनुसरण करना चाहिये तभी वह स्वर्ग प्राप्त करेगा।

सोमवार, 23 मई 2016

५.१३ जरूरी बातें

न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा न ते वृद्धा ये न वदन्ति धर्मम्।
नासौ धर्मो यत्र न सत्यमस्ति न तत्सत्यं यच्छलेनाभ्युपेतम्।।५.१३।।

जिस सभा में बड़े - बूढ़े  न हों , वह सभा सभा नहीं।  जो वृद्ध व्यक्त्ति धर्म सम्बन्धी बातें न करें , वह वृद्ध नहीं।  वह धर्म नहीं जिसमें सत्य न हो तथा वह सत्य नहीं जिसमें छल - कपट  हो।

५.१२ धर्म के मार्ग

इज्याध्ययनदानानि तपः सत्यं क्षमा घृणा।
अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्टविधः स्मृतः।।५.१२.१।।

यज्ञ करना , वेदाध्ययन , दान , तपस्या , सत्य , क्षमाशीलता , दयालुता और लोभ न होना अर्थात् संतोष - ये आठ धर्म के मार्ग कहे गये हैं।

तत्र पुर्वचतुर्वर्गो दम्भार्थमपि सेव्यते।
उत्तरश्र्च चतुर्वर्गो नामहात्मसु तिष्ठति।।५.१२.२।।

आठ प्रकार के धर्म के मार्ग होते हैं।  इनमें से पहले चार कर्म - यज्ञ करना , अध्ययन करना , ज्ञान और तप , इन चारों गुणों का पाखण्ड के लिये सेवन किया जा सकता है। लेकिन अंतिम चार कर्मा - सत्य , क्षमा , दया एवं लोभरहित होना , ये चारों गुण महात्माओं के पास ही होते हैं।  अतः जो सज्जन नहीं है उनमें नहीं रह सकते।

५.११ सज्जन के गुण

यज्ञो दानमध्ययनं तपश्र्च चत्वार्येतान्यन्ववेतानि सदिभः।
दमः सत्यमार्जवमानृशंस्य चत्वार्येतान्यनुयान्ति सन्तः।।५.११।। 

यज्ञ , दान , अध्ययन और तप , ये चार गुण सदैव सज्जनों से सम्बन्ध रखते हैं।  इन्द्रियों का दमन , सत्य , नम्र स्वभाव बनाये रखना और कोमलता , ये चार गुण ऐसे हैं जिनका अनुसरण सज्जन लोग करते हैं।