यक्ष उवाच
किमर्थं ब्राह्मणे दानं किमर्थं नटनर्तके।
किमर्थं चैव भृत्येषु किमर्थं चैव राजसु।।२.१८.१।।
ब्राह्मण को दान क्यों दिया जाता है ?
नट नर्तकों हेतु दान क्यों दिया जाता है ?
सेवकों को दान क्यों दिया जाता है ?
राजाओं को दान क्यों दिया जाता है ?
युधिष्ठिर उवाच
धर्मार्थं ब्राह्मणे दानं यशोऽर्थं नटनर्तके।
भृत्येषु भरणार्थं वै भवार्थं चैव राजसु।।२.१८.२।।
धर्म हेतु ब्राह्मणों को दान दिया जाता है।
नट नर्तकों को यश प्राप्त करने हेतु दान दिया जाता है।
सेवकों को दान उन्हें अपने पोषण करने हेतु दिया जाता है।
राजाओं को अपने प्रताप में वृद्धि करने हेतु दान दिया जाता है।
किमर्थं ब्राह्मणे दानं किमर्थं नटनर्तके।
किमर्थं चैव भृत्येषु किमर्थं चैव राजसु।।२.१८.१।।
ब्राह्मण को दान क्यों दिया जाता है ?
नट नर्तकों हेतु दान क्यों दिया जाता है ?
सेवकों को दान क्यों दिया जाता है ?
राजाओं को दान क्यों दिया जाता है ?
युधिष्ठिर उवाच
धर्मार्थं ब्राह्मणे दानं यशोऽर्थं नटनर्तके।
भृत्येषु भरणार्थं वै भवार्थं चैव राजसु।।२.१८.२।।
धर्म हेतु ब्राह्मणों को दान दिया जाता है।
नट नर्तकों को यश प्राप्त करने हेतु दान दिया जाता है।
सेवकों को दान उन्हें अपने पोषण करने हेतु दिया जाता है।
राजाओं को अपने प्रताप में वृद्धि करने हेतु दान दिया जाता है।
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